Shiv Temples । tular gufa
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  • Famous Shiv Temples of Bastar । बस्तर के प्रसिद्ध 7 शिंव मंदिर

    बस्तर की प्रसिद्ध शिंव मंदिर। Famous shiv temple of Bastar

    Shiv Temple :- बस्तर में अलग अलग जगह शिवलिंग प्राचीन काल से स्थापित है, शिंव मंदिर के प्राचीन काल के मंदिरों को देखने केलिए लोग शहरों से यहाँ आते रहते है, बस्तर में प्रकृति एवं प्राचीन मंदिरों का भर मार है। बस्तर क्षेत्र घने जंगलों एवं पहाड़ी नदियों से घिरा हुआ क्षेत्र है और यहाँ के लोग सीमित और संस्कृति धार्मिक प्रिय है।

    बस्तर अपने व्यक्तित्व एवं संस्कृति धार्मिक स्थल से प्रसिद्ध है, बस्तर में अनेक प्राचीन मंदिरे है जिन्हे देखने लोग पुरे भारत भर से आते है। बस्तर में हर साल महाशिवरात्री को पूजा और मेला होता है, लोग महाशिवरात्री के दिन यहाँ भक्ति भाव से शिंवलिंग की पूजा करते है।

    जिसमें बारसुर का शिंव मंदिर, समलूर का शिंव ,मंदिर ,अबूझमाड़ का तुलारा गुफा, गुमरगुंडा का शिंव मंदिर, दंतेवाड़ा के भैरव बाबा मंदिर ,, भैरमगढ़ के भैरव बाबा मंदिर ,बस्तर का चित्रकोट का प्राचीन शिवालय, इसके अतिरिक्त बस्तर के हर ग्राम में शिवमंदिर(shiv temple) अवश्य ही मिलेगा। बस्तर तो भगवान शिव की भूमि है, यहाँ के हर कण में भगवान शिव है। आदिवासियों के लिंगोदेव भगवान शिव का ही रूप है।

    भैरव बाबा मंदिर दंतेवाड़ा। Bhairav ​​Baba Temple Dantewada

    बस्तर में लगभग हर जगह भैरव देवता की प्रतिमायें मिलती है,छिंदनागों के समय देवी को समर्पित सभी मंदिरो के साथ साथ भैरव देवता के मंदिर बनवाये थे। मान्यता है, कि भैरव देवता के दर्शन के बिना देवी दर्शन अधूरा है।

    भैरव का अर्थ होता है कि भय का हरण कर गजत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है की भैरव शब्द का तीन अक्षरों में ब्रहमा विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है,भैरव शिंव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते है। उल्लेख है की शिंव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई है।

    बाद में उक्त रुधिर के दो भाग हो गए, पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव भगवान शिंव के पांचवेअवतार भैरव को भैरवनाथ भी काहा जाता है। देवी दंतेश्वरी मंदिर मे नटमंडप अंदर हि स्तंभो पर आधारी प्राचीन मंदिर है। उस मंदिर मे भगवान भैरव की प्रतिमा स्थापित है। सामने का खपरैल वाला मंडप बनाने के कारण यह भैरव मंदिर भी मुख्य मंदिर से जुड़ गया है,इसके अलावा शंकनी डाकिनी नदियों के संगम के उस पर भैरव बाबा मंदिर है।

    भैरव बाबा मंदिर भैरमगढ। Bhairav ​​Baba Temple Bhairamgarh

    बस्तर एक खोज है, कभी न ख़त्म होने वाली जितना हम इसके जानने की कोशिश करते हैं उतनी ही हमारी जिज्ञासा बढ़ती जाती है बस्तर में ऐसे कई जगह है। जिनका रहस्य आज भी बना हुआ है या कहें की इन जगहों के बारे में हम लोगों को काफी कम जानकारी है। भैरमगढ़ में एक प्राचीन मंदिर है जो बाबा भैरव देव को समर्पित है ऐसा कहा जाता है.

    यहाँ पाई गयी इन दो पाषाण पद चिन्हों में से एक छोटा माता दंतेश्वरी का और दूसरा बड़ा बाबा भैरव देव का है। भैरमगढ़ के ऐतिहासिक महत्व को प्रमाणित करने की जरुरत नहीं, यह तो स्वयं ही अपना महत्व प्रतिपादित कर रही है। बीजापुर जिले मे कई पुरातात्विक ग्राम हैं जिनमें से एक है भैरमगढ़, जहां स्थित है भैरम बाबा मंदिर है। देखने मे तो यह मंदिर सामान्य सा जान पड़ता है, पर यहाँ मंदिर के सामने स्थित है भैरव बाबा और माँ दंतेश्वरी की यह अद्वितीय पद- चिन्ह शिला है भैरमगढ़ में भैरव देवता के कही बड़ी बड़ी प्रतिमाएँ होने के कारण इसका नाम भैरमगढ़ पड़ा।

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    चित्रकूट का प्राचीन शिंव मंदिर। Ancient Shiv Temple of Chitrakoot

    चित्रकूट प्राचीन काल से धार्मिक आस्था का केन्द्र रहा है। चित्रकूट जलप्रपात के दोनों ओर अनेक प्राचीन मंदिर व देव स्थल हैं। जलप्रपात के चित्रकूट छोर में अनके शिंव मंदिर(shiv temple) स्थापित हैं, बस्तर के चित्रकूट जलप्रपात के पास ही एक प्राचीन विशाल शिंव मंदिर है। इस शिवालय का शिवलिंग बेहद ही विशाल एवं भव्य है।

    यह शिवलिंग बस्तर के सभी शिवलिंग में सबसे विशाल एवं भव्य है। जिससे बेहद ही कम लोग परिचित हैं। जगदलपुर मार्ग में होने के बावजूद भी बहुत से लोग आज भी इनसे अपरिचित है। चित्रकोट जलप्रपात को देखने एवं घूमने के लिए लोग बाहर बाहर से आते है,पर चित्रकोट के पास ही शिंव मंदिर(shiv temple) है।

    इसके बारे मे बहुत कम लोग को पता है चित्रकोट जलप्रपात के समीप प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है। जिसमें आसपास के ग्रामों के ग्रामीणों व पर्यटकों की भीड़ रहती है। इस मेले की लोकप्रियता देखकर जिला प्रशासन द्वारा चित्रकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता है।

    समलूर का शिंव मंदिर। Shiv Temple of Samloor

    छत्तीसगढ के दंतेवाडा जिले के समलूर स्थित 11 वीं शताब्दी के प्राचीन करली महादेव मंदिर है। बारसूर के मामा- भांजा मंदिर की तर्ज पर समलूर में नागर शैली में निर्मित मंदिर 11 वीं शताब्दी में तत्कालीन नागवंशी शासक सोमेश्वर देव की महारानी सोमलदेवी ने बनवाया था।सोमलदेवी के नाम पर ही समलूर गांव बसाया गया था।

    इस मंदिर की जलहरी व शिवलिंग बत्तीसा मंदिर की जलहरी से मिलती जुलती शैली में बनी है। विशिष्ट नक्काशीदार जलहरी वाले इस शिवालय को देखने बड़ी संख्या में सैलानी व दर्शनार्थी पहुंचते हैं। शिंव मंदिर(shiv temple) में सावन सोमवार के अलावा महाशिवरात्रि, माघपूर्णिमा जैसे खास अवसरों पर दर्शनार्थियों की कतार लगती है। महाशिवरात्रि पर मंदिर परिसर के बाहर मेला लगता है।

    बारसुर का बत्तीसा शिंव मंदिर। Battisa Shiv Temple of Barsur

    बारसुर को तालाबों एवं मंदिरो का शहर काहा जाता था बारसुर मे 11वीं और 12 वीं शताब्दी मे 147 मंदिर और तालाब थे दक्षिण बस्तर की ऐतिहासिक नगरी बारसूर में स्थित प्राचीन बत्तीसा मंदिर न सिर्फ अपने 32 खंभों की वजह से मशहूर है, बल्कि दोहरे गर्भगृह वाले इस अनूठे शिवालय की दोनों जलहरियां भी इसे और खास बनाती हैं।

    जलहरियाँ चारों दिशाओं में घुमाई जा सकती हैं, पूरे बस्तर संभाग में दो गर्भगृह वाला यह इकलौता शिवालय है। एक ही छत के नीचे दो शिवालय वाला यह मंदिर 32 पाषाण स्तंभों पर खड़ा है, इसलिए यह बत्तीसा मंदिर कहलाता है। इस मंदिर का निर्माण 1030 ईस्वी में नागवंशीय नरेश सोमेश्वर देव की रानी ने करवाया था।

    Battisa Shiv Temple of Barsur
    Battisa Shiv Temple of Barsur

    यहां के शिवालयों की जलाधारी को पूरे 180 अंश में घुमाकर फिर से अपने मूल स्थान पर लाया जा सकता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति गर्भगृह में स्थपित जलहरी को पूरी तरह से घुमा कर फिर पुन: मूल स्थान पर ला देता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है। बारसूर का बत्तीसा मंदिर बस्तर के सभी मंदिरों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है।

    बारसूर नागकालीन प्राचीन मंदिरों के लिये पुरे छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध है। यहाँ के मंदिरों की स्थापत्य कला बस्तर के अन्य मंदिरों से श्रेष्ठ है। यह मंदिर पुरे बस्तर का एकमात्र मंदिर है जिसमें दो गर्भगृह एवं संयुक्त मंडप है। पूरे बस्तर संभाग में दो गर्भगृह वाला यह इकलौता शिवालय है।

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    तुलार गुफा का शिंव मंदिर। Shiv Temple of Tular Cave

    ऊंचे पहाड़ पर है ये गुफा जहां पत्थरों के बीच से पानी रिसकर सालभर होता रहता है शिवलिंग का अभिषेक पूरा बस्तर संभाग रहस्यों से भरा है ऐसा ही बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिले के बारसूर ब्लॉक के जंगल इलाके में एक रहस्यमयी गुफा है जिसे तुलार गुफा कहते है ,, जिसके अंदर कई सालों से एक शिवलिंग विराजित है जिस मे साल के 365 दिन प्राकृतिक रूप से केवल शिवलिंग पर ही पानी रिसता रहता है.

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    Shiv Temples । tular gufa। PC Awesome Bastar

    जिसे हम यह कह सकते हैं कि सालभर प्रकृति शिंव का जलाभिषेक करती रहती है। लेकिन ये जलाभिषेक के लिए पानी कहां से आता है इसकी जानकारी अभी तक किसी को नहीं है। तुलार गुफा जाने के लिए पैदल या दोपहिया वाहन से जा सकते हैं। इस रास्ते पर करीब 2 से 3 नाले पड़ते हैं। अगर पानी ज्यादा हो तो वाहन पार कराने में काफी दिक्कत होती है। कई उंचे रास्ते भी हैं।

    जहां वाहन का चढ़ पाना कठिन होता है। और बहुत थकावट होती है,लेकिन जैसे ही भगवान शिंव की दर्शन होते ही पूरी थकावट मीट जाती है। एक जनश्रुति के अनुसार कहा जाता है कि, इस गुफा में बाणसुर नामक राक्षस ने खुद को महान बनाने के लिए कई वर्षों तक तपस्या की थी। इसी तपस्या के लिए बाणसुर ने इस गुफा की रचना की थी और यहां सालों तक तपस्या की थी।

    गुमरगुंडा का शिंव मंदिर। Shiv Temple of Gumargunda

    दंतेवाड़ा, गुमरगुंडा के शिवालय में एक साथ तीन शिवलिंग पर लोग जल चढ़ाते हैं। यह शिवलिंग मंदिर (shiv temple) से लगे कुंड से मिले हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहाँ सावन ही नहीं किसी भी सोमवार को जल चढ़ाओ फल अवश्य मिलता है। नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा के बीजापुर मार्ग में स्थित गुमरगुंडा स्थित शिवालय की स्थापना 41 साल पहले हुई थी लेकिन एक दशक से इसकी महत्ता बढ़ी।

    लोग अब सावन और शिवरात्रि ही नहीं बारह माह किसी भी दिन आराधना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर की खासियत है कि यहाँ एक पहाड़ी नाला का पानी मंदिर के नीचे स्थित कुंड से होकर गुजरता है।वहीं मंदिर में एक साथ तीन शिवलिंग की स्थापना की गई है। गर्मियों में नाला सूख भी जाए तो कुंड में पानी बना रहता है।

    Shiv Temple of Gumargunda
    Shiv Temple of Gumargunda

    इसी कुंड के पानी से श्रद्घालु तीनों शिवलिंग को जलाभिषेक करते हैं। यहाँ हर साल महाशिंवरात्री को पूजा और मेला होता है।मंदिर और आश्रम के केयर टेकर स्वामी विशुद्घानंद सरस्वती बताते हैं कि आश्रम के संस्थापक और मंदिर स्थापना के प्रणेता स्वामी सदाप्रेमानंद ने यहां शिवाराधना 1970 के दशक में शुरु किया था।

    इसके बाद वे इस पहाड़ीनुमा चट्टान में एक साल तक तपस्या भी की और आदिवासियों को मांस- मदिरा से दूर रहने की सलाह देते थे और आध्यात्म से जोड़ना शुरु किया था।उनकी हत्या के बाद अन्य श्रद्धालुओं के सहयोग से 2015 में मंदिर बनाकर भगवान की प्राण प्रतिष्ठा की गई। यह मंदिर और यहाँ संचालित आश्रम ऋषिकेश आश्रम काशी से संबंद्घ हैं। इसलिए यहाँ के बच्चों को वैदिक संस्कार भी दिए जा रहे हैं।

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